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खामोशी का लोकतंत्र और सुविधाजनक विपक्ष

मालव दर्शन

विशेष-

राहुल जैन

खामोशी का लोकतंत्र और सुविधाजनक विपक्ष

नीमच जिला आज केवल प्रशासनिक अव्यवस्था का शिकार नहीं है, यह राजनीतिक निष्क्रियता और सुविधानुसार सक्रिय होने वाले विपक्ष की मानसिकता से भी जूझ रहा है। हालात इतने विकट हो चुके हैं कि सच बोलना अब नागरिक अधिकार नहीं, जोखिम भरा कदम बन गया है। और शायद इसी डर, दबाव या स्वार्थ ने पूरे जिले पर एक अस्वस्थ खामोशी थोप दी है।

भ्रष्टाचार, अवैध गतिविधियाँ, न्याय के लिए भटकती जनता, आत्महत्याओं के मामले, सत्ता का दुरुपयोग- ये सब किसी बंद कमरे की फुसफुसाहट नहीं हैं। चाय की दुकानों से लेकर गांव की चौपाल तक इनकी चर्चा है। फिर भी जिन मुद्दों पर जनप्रतिनिधियों को सबसे आगे खड़ा होना चाहिए, उन्हीं पर सबसे ज्यादा चुप्पी है।

कंचन बाई की मधुमक्खियों के काटने से हुई दर्दनाक मौत इसका ताज़ा उदाहरण है। यह सिर्फ एक हादसा नहीं था, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और आपात व्यवस्था की विफलता का गंभीर मामला था। लेकिन विपक्ष ने भी इस पर तत्काल आवाज़ उठाने के बजाय दो दिन बाद संज्ञान लिया। सवाल यह है-क्या एक गरीब महिला की जान की कीमत राजनीतिक सुविधा से भी कम है? क्या प्रतिक्रिया भी अब अवसर देखकर दी जाती है?

नगर पालिका परिषद के भीतर विपक्ष दिखाई तो देता है, पर उसका विरोध सीमित और चयनित मुद्दों तक सिमटा रहता है। विकास कार्यों की गुणवत्ता, ठेकेदारी में अनियमितता, अवैध निर्माण, स्वच्छता व्यवस्था की बदहाली-ये सभी सीधे जनता के जीवन को प्रभावित करने वाले विषय हैं। लेकिन इन पर कोई सतत, ठोस और प्रभावी दबाव नहीं दिखता। विरोध होता भी है तो इस तरह कि किसी बड़े समीकरण को ठेस न पहुँचे। जैसे व्यवस्था नहीं, केवल व्यक्तियों को निशाना बनाना ही लक्ष्य रह गया हो।

जिला स्तर पर भी स्थिति कम भयावह नहीं। पुलिस प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या करने वाले आरक्षक का मामला पूरे तंत्र पर गहरे सवाल खड़े करता है। उसका छोड़ा गया प्रेस नोट सिर्फ व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि संस्थागत भ्रष्टाचार का दस्तावेज़ था। लेकिन यह मुद्दा भी धीरे-धीरे खबरों की भीड़ में गुम कर दिया गया। विपक्ष ने इसे जनांदोलन क्यों नहीं बनाया? क्या सत्ता के असहज हो जाने का डर इतना भारी है?

जनप्रतिनिधि की गाड़ी और गनमैन के दुरुपयोग का मामला भी सामने आया। सरकारी संसाधनों का निजी उपयोग कोई छोटी चूक नहीं, लोकतांत्रिक नैतिकता पर चोट है। फिर भी कार्रवाई के बजाय खामोशी क्यों? क्या सत्ता के करीब होना जवाबदेही से मुक्त कर देता है?

आज नीमच की जनता थक चुकी है। आवेदन, शिकायतें, धरना-सब कुछ करने के बाद भी जब परिणाम शून्य रहे, तो उम्मीद धीरे-धीरे दम तोड़ने लगती है। यही वह क्षण होता है जब अन्याय सामान्य और चुप्पी समझदारी लगने लगती है। और यही लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक स्थिति है।

लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं है। यह निरंतर सवाल पूछने की संस्कृति है। जब विपक्ष प्रतीकात्मक बन जाए, जब विरोध केवल कैमरों तक सीमित रह जाए, जब हर गंभीर मुद्दा 卐समय के साथ ठंडा हो जाएगा卐 मान लिया जाए-तब लोकतंत्र का ढांचा भले खड़ा दिखे, उसकी आत्मा मर चुकी होती है।

नीमच को दिखावटी बयानबाज़ी नहीं, निडर और निष्पक्ष विपक्ष चाहिए। ऐसा विपक्ष जो व्यक्ति नहीं, व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करे। जो हर कंचन बाई, हर पीड़ति आरक्षक और हर आम नागरिक की आवाज़ को तत्काल और निर्णायक रूप से उठाए। क्योंकि आने वाला समय यह जरूर पूछेगा-जब अन्याय सामने था, तब सब चुप क्यों थे? और उस दिन शायद जवाब देने के लिए न मंच बचेगा, न साहस, न अवसर।

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