मालव दर्शन
विशेष-
राहुल जैन
जिंदा था तो चुप्पी, मर गया तो चार्जशीट !
एक आरक्षक की आत्महत्या के बाद अचानक सिस्टम की ज़बान खुल गई। अब बताया जा रहा है कि वह शराब पीकर ड्यूटी पर आता था, उस पर कई मामले दर्ज थे, वह अनुशासनहीन था, अधिकारियों से बदतमीजी करता था, ड्यूटी में लापरवाही करता था। सवाल यह नहीं है कि ये बातें सही हैं या गलत। सवाल यह है कि ये बातें जिंदा रहते क्यों 'खबर' नहीं बनीं और मरने के बाद क्यों 'बयान' बन गई? जब वह रोज़ वर्दी पहनकर थाने आता था, जब वह सिस्टम का हिस्सा था, तब ये सब बातें फुसफुसाहट थीं। तब इन्हें दबाया गया, नजरअंदाज किया गया, फाइलों में दफन कर दिया गया। लेकिन जैसे ही उसने आत्महत्या की और जाते-जाते सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए-उसी पल उसका पूरा चरित्र सार्वजनिक कर दिया गया। यह महज संयोग नहीं हो सकता। अगर वह शराब पीकर ड्यूटी पर आता था, तो तब प्रेस नोट क्यों नहीं निकले ? अगर वह इतना ही अनुशासनहीन था, तो तब कार्यवाही क्यों नहीं हुई? अगर वह अधिकारियों से बदतमीजी करता था, तो तब 'जीरो टॉलरेंस' कहां चला गया? साफ है-तब चुप्पी सुविधाजनक थी। असल परेशानी यह नहीं थी कि वह कैसा आरक्षक था। असली परेशानी तब शुरू हुई जब उसने मरते-मरते एक नोट छोड़ दिया। एक ऐसा नोट जिसने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली, अंदरूनी भ्रष्टाचार और नैतिक खोखलेपन पर उंगली रख दी। यह बहुत पुराना तरीका है। जब जवाब नहीं देना हो-तो सवाल पूछने वाले को ही संदिग्ध बना दो। जब व्यवस्था कटघरे में हो-तो मरने वाले की फाइल खोल दो। आज जो बातें उछाली जा रही हैं, वे अगर इतनी ही गंभीर थीं, तो उस समय सिस्टम ने क्या किया? अगर सिस्टम ने कुछ किया भी, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? क्यों उस आरक्षक को तब 'समस्या' नहीं बताया गया, जब वह जिंदा था? क्योंकि तब वह सिस्टम का हिस्सा था। और अब वह सिस्टम के लिए खतरा बन गया है-भले ही मरकर। यह पूरा घटनाक्रम इस ओर इशारा करता है कि सिस्टम को गलती सुधारने से ज्यादा, अपनी छवि बचाने की फिक्र है। आत्महत्या के कारणों पर बात करने के बजाय ध्यान भटकाया जा रहा है। सवाल ऊपर की ओर जाने के बजाय नीचे की ओर धकेले जा रहे हैं। यह भी गौर करने लायक है कि इन आरोपों का सिलसिला मौत के बाद ही क्यों शुरू हुआ। क्या इससे पहले किसी ने जनता को बताया कि विभाग के भीतर ऐसी गंभीर अनुशासनहीनता मौजूद है? नहीं। क्योंकि तब जवाबदेही तय होती। तब यह सवाल उठता कि इतने 'समस्याग्रस्त' व्यक्ति को सिस्टम ने पाल क्यों रखा था? यह किसी एक आरक्षक के बचाव में नहीं है। यह उस खतरनाक प्रवृत्ति के खिलाफ है, जहां मौत के बाद इंसान को कमजोर साबित कर के व्यवस्था खुद को निर्दोष साबित करना चाहती है। अगर आज इस तरीके को स्वीकार कर लिया गया, तो कल कोई और वर्दीधारी टूटेगा। और फिर वही होगा ?